Saturday, March 21, 2009
जय शनिदेव......
जय शनि दे दे मनी.... यही अवाज़ हर शनिवार सुनाई देती है... पर आज सुबह इस आवाज़ को सुनने के बाद से झुमरू जी हद से ज्यादा परेशान हो गए। परेशान हों भी क्यों ना। भई... एक साथ 8 - 10 माँगने वाले आ जाएँ तो कोई कैसे सँभाले.... और फिर झुमरू जी तो ....खैर.... दरअसल हुआ यूँ कि झुमरू जी की आँख खुली तो जय शनि - जय जय शनि आधा नारा तो यही था पर इससे आगे.... दे दे मनी नहीं.... ले ले मनी... माजरा क्या है समझ नहीं आया.... जनाब आगे तो सुनिए जय शनि - जय जय शनि दे दे मनी नहीं.... ले ले मनी... दे दे वोट.... भई मौसम चुनावों का है ... तो शोर तो ये ही सुनाई देना था.... पर असली हैरानी तो हुई घर से बाहर आने के बाद... तेल में डूबे शनिदेव की जगह लोहे के तखते पर सारी पार्टियों के चुनाव चिह्न। प्रचार का नया फंडा... और शनिदेव भी पैसे माँग नहीं रहे पैसे बाँट रहे हैं। क्या ये कलियुग है... जी हाँ ये ही कलियुग है... 2009 का कलियुग.... लोकसभा चुनाव सिर पर हैं... पैसे लीजिए और चुनिए... मनपसंद सरकार..... और क्या क्या देखना बाकी है यार....
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